Buddhism

बुद्ध पूर्णिमा किस उपलक्ष्य में मनाई जाती है?
बुद्ध पूर्णिमा के दिन ही गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था, उसी दिन उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी और उसी दिन उनका निर्वाण (निधान) भी हुआ था। गौतम बुद्ध के उपलक्ष में ही बुद्ध पूर्णिमा में मनाई जाती है। बुद्ध पूर्णिमा हर साल मुख्यत: बोधगया और सारनाथ में मनाई जाती है। इसके साथ ही भारत के कई अन्य बौद्ध क्षेत्रों जैसे सिक्किम, लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश, उत्तर बंगाल के क्षेत्रों कालिमपोंग, दार्जिलिंग और कुरसेआंग आदि में भी इसको त्यौहार की तरह मनाया जाता है।

2020 में बुद्ध पूर्णिमा कब है?
बुद्ध पूर्णिमा 7 मई, 2020 को है। इस दिन बौद्ध धर्म के उपासक बौद्ध मंदिरों में ध्वज फहराते हैं। महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं और उनके शिष्यों के संघ के सम्मान में स्तुति और भजन गाए जाते हैं। साथ ही बौद्ध धर्म के लोग विशेष रूप से इस दिन सफेद कपड़े पहनते हैं और ध्यान (ध्यान) में अपना दिन बिताते हैं।

महात्मा बुद्ध का जीवन परिचय
एशिया का ज्योतिपुंज कहे जाने वाले महात्मा गौतम बुद्ध का जन्म वैशाख मास की पूर्णमासी को कपिलवस्तु के लुम्बिनी में 563 ईसा पूर्व क्षत्रिय कुल में हुआ था। उनके बचपन का नाम सिद्धार्थ है था। उनके पिता का नाम शुद्धोधन और माता का नाम मायादेवी था। इनकी माता की मृत्यु उनके जन्म के सातवें दिन ही हो गयी थी जिसके बाद इनका पालन पोषण इनकी सौतेली माता प्रजापति गौतमी ने किया था। उनके पिता शाक्यगण के मुखिया थे और राजकुमार होने के कारण बुद्ध की परवरिश पूरे राजसी थथ-बाठ से हुईं।

16 वर्ष की आयु में बुद्ध का विवाह यशोधरा के साथ हुआ।
कुछ वर्ष पश्चात उन्हें पुत्र प्राप्ति हुई जिसका नाम राहुल रखा गया।
बुद्ध का मन बचपन से ही राजपाट में नहीं लगता था और हमेशा उन्हें एकांत में बैठा हुआ देखा जाता था।
माना जाता है कि गौतम बुद्ध विष्णुलोक से आई हुई आत्मा थे
यही कारण था कि सभी राजसी थथ उपलब्ध होने के बाद भी उन्हें यहाँ के सभी सुख फीके से लगते थे।
क्यों गौतम बुद्ध को दुखों से दूर रखा गया था?
जब गौतम बुद्ध अपनी माँ के गर्भ में थे तब इनकी माता ने एक दिन एक स्वप्न देखा कि छः हाथियों का एक झुंड अपनी सूंडो में कमल के फूल लाकर उनके चरणों में अर्पित कर रहे थे। इस स्वप्न के बारे में विद्वानों को बताने पर विद्वानों ने शुद्धोधन (महात्मा बुद्ध के पिता) को बताया कि आपकी होने वाली संतान पूरी दुनिया को जीत कर एक पराक्रमी शासक की तरह राज्य करेगी या फिर वे एक सन्यासी बन लोगों के बीच ज्ञान प्रचार करेंगे।

बुद्ध पूर्णिमा हिंदी : इसी कारण से बुद्ध की सभी सुख सुविधाओं का ध्यान उनके महल में ही रखा गया था। उनके पिता उन्हें जीवन में घटित होने वाले दुखों से कोसों दूर रखते थे ताकि विद्वानों द्वारा सन्यास धारण करने की बात कद रूप सत्य साबित न हो।

बुद्ध के गृहत्याग का क्या कारण था?
एक दिन महात्मा बुद्ध को कपिलवस्तु की सैर की इच्छा हुई और वे अपने सारथी को साथ लेकर चलने पर निकले। मार्ग में चार दृश्यों को देखकर घर त्याग कर सन्यास लेने का प्रण लिया।

बुर्जुग व्यक्ति
एक बीमार व्यक्ति
शव
एक सन्यासी
बुद्ध पूर्णिमा हिंदी : इनको देखकर बुद्ध का मन विचलित हो गया तो उनके सारथी ने उन्हें बताया कि ये जीवन का कटाव सत्य है। हर व्यक्ति को एक दिन बूढ़ा होना है और बुढ़ापा अपने साथ रोग लेकर आता है। इसके पश्चात मृत्यु का आना भी एक परम सत्य है। इन दृश्यों को देखने के उपरांत बुद्ध इस जन्म मरण के चक्र और मनुष्यों के दुखों का कारण और उसका समाधान ढूंढने के लिए व्याकुल हो उठे। उस समय उनकी आयु मात्र 29 वर्ष थी जिस समय उन्होंने गृहत्याग किया था। बौद्धधर्म में उनके गृहत्याग को महाभिनिष्क्रमण कहा गया है।

गीता जी के अध्याय 3 श्लोक 8 में, घर त्यागकर, हठयोग साधना करने को निषेध बताया है और कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करते-करते भक्ति कर्म करने को श्रेष्ठ बताया है। गृहत्याग के बाद बुद्ध ने वैशाली के आलार्कलाम जो की बुद्ध के पहले गुरु थे, उनसे सांख्य दर्शन की प्रथम पूजा की। उसके बाद राजगीर पहुँचकर अपने दूसरे गुरु रुद्रकरामपुत्त से शिक्षा ग्रहण की।

जब तक गुरू मिले न साचा तब
तक गुरू करो दस पाँच ।।

कबीर साहेब जी
बुद्ध पूर्णिमा हिंदी : मनुष्य जीवन में गुरु का बहुत महत्व है। एक गुरू ही है जो मानव जीवन को अनमोल बताता है और जन्म मृत्यु के रोग से छुटकारा दिला सकता है। हालांकि अल बुद्ध को उसके जीवनकाल में कोई कुछ ज्ञान ज्ञान देने वाला सच्चा गुरु न मिला। कबीर साहेब जी अपने सत्संग में बताते हैं कि पिछले पुण्य कर्मों वाली आत्मा परमात्मा को याद करें बिना नहीं रह पाती। तब मैया भी अपने पैरों में बेड़ी नहीं डाल सकती थीं।

कैसे बना सिद्धार्थ गौतम, राजा से महात्मा बुद्ध?
लेकिन बुद्ध को अपने सवालों का जवाब किसी गुरु से नहीं मिला। आगे चलकर उरुवेला में बुद्ध को उन्हीं की तरह पांच जिज्ञासु साधक मिले। 6 साल तक बिना अन्नजल ग्रहण किए कठिन तपस्या के बाद 35 वर्ष की अवस्था में वैशाख पूर्णिमा की रात निरंजना (फल्गु) नदी के किनारे बुद्ध को एक ज्योतिपुंज दिखाई दिया, जो कि ज्योति निरंजन काल ब्रह्म अपनी ज्योति रूप में दिखाई दे रहा था।

बुद्ध पूर्णिमा हिंदी : उनका शरीर मरणासन्न अवस्था में पहुँच गया था उनकी साधना भले ही गलत थी लेकिन वे भी परमपिता परमात्मा के ही बच्चे थे इसलिए परमात्मा ने एक माई को प्रेरणा की जिन्होंने उन्हें खीर खिलाई। दैनिक थोड़ा थोड़ा अन्न ग्रहण करने से उनकी स्थिति सुधरी, हालत ठीक होते ही उठकर खड़े हुए और उनका पहला कथन था

भुखमरी से मुक्ति नहीं मिल सकती अर्थात् भूखा रहने से भगवान नहीं मिलते।

महात्मा बुद्ध, बुद्ध पूर्णिमा उद्धरण हिंदी में
बौद्ध धर्म के अनुसार निर्वाण क्या है?
दौड़, का तात्पर्य है पुनर्जन्म का पथ, + निरस्त, का तात्पर्य है छोड़ना या “पुनर्जन्म के पथ से दूर होना। लालच, घृणा और भ्रम का नाश ही निर्वाण है। निर्वाण ही परम आनंद है। ”(बौद्ध धर्म के मतानुसार)। बुद्ध का आध्यात्मिक ज्ञान शून्य था। उन्होंने अपनी अल्पज्ञ बुद्धि के आधार पर अस्तुतात्मक अध्ययन की सरंचना की और कहा इन अष्टांगिक उपचार के पालन के उपरांत मनुष्य की भवतृष्णा नष्ट हो जाती है और उसे निर्वाण मोक्ष प्राप्त हो जाता है। जबकि ऐसा नहीं है।

बुद्ध पूर्णिमा हिंदी: बौद्धधर्म में पुनर्जन्म की मान्यता है लेकिन इसमें आत्मा की परिकल्पना भी नहीं है। बुद्ध के ज्ञान और समाधान से किसी को कोई लाभ नहीं हुआ तो बुद्ध की शिक्षाओं को मानने वालों ने ये समझ लिया कि भगवान होता ही नहीं है जबकि वास्तविकता तो ये थी कि महात्मा बुद्ध के पास वास्तविक ज्ञान ही नहीं था। अगर भक्ति करते हुए भी साधक को लाभ नहीं मिल रहा है तो ये समझ लें कि भक्ति करने कि विधि सही नहीं है, न कि भगवान होते ही नहीं हैं।

गीता अध्याय 16 के श्लोक 23-24 में प्रमाण है कि जो साधक शास्त्र पद्धति त्यागकर मनोमय आचरण करता है अर्थात् मनमानी साधना करता है, उसे न तो कोई सुख प्राप्त होता है, न कोई सिद्धि और मोक्ष। सब वीथ है। शास्त्र विरूद्ध साधना, भूखे रहने से और हठयोग करते हुए यदि साधक की मृत्यु होती है तो वह पुनर्जन्म और चौरासी लाख योनियों में जाने से बच नहीं सकता।

'' कबीर वाणी '' पृष्ठ 137 पर लिखा गया है शास्त्रानुकुल साधना करने से पूर्ण मोक्ष होगा। श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में गीता ज्ञान दाता ने पूर्ण मोक्ष प्राप्ति के लिए अपने से अन्य भगवान की शरण में जाने को कहा है कि हे अर्जुन! सभी भाव से तू थम के शरण में जा रहा है। उस भगवान की कृपा से ही तू परम शान्ति को और सनातन परमधाम को प्राप्त होगा।




बुद्ध पूर्णिमा (बुद्ध पूर्णिमा हिंदी) के उपलक्ष्य में आइये जानते हैं, बुद्ध के जीवन और बौद्ध धर्म से जुड़ी कुछ विशेष जीवनकरी। वेसक (पाली: वेसाख; संस्कृत: वैशाख) एक उत्सव है जो विश्वभर के बौद्धों और अधिकांश हिन्दुओं द्वारा बुद्ध पूर्णिमा (पूर्णिमा पंचांग के अनुसार मास की 15 वीं और शुक्लपक्ष की अंतिम तिथि है जिसे चंद्रमा चंद्रमा आकाश में पूरा होता है) को मनाया जाता है। ।

बुद्ध पूर्णिमा किस उपलक्ष्य में मनाई जाती है?
बुद्ध पूर्णिमा के दिन ही गौतम बुद्ध का जन्म हुआ था, उसी दिन उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी और उसी दिन उनका निर्वाण (निधान) भी हुआ था। गौतम बुद्ध के उपलक्ष में ही बुद्ध पूर्णिमा में मनाई जाती है। बुद्ध पूर्णिमा हर साल मुख्यत: बोधगया और सारनाथ में मनाई जाती है। इसके साथ ही भारत के कई अन्य बौद्ध क्षेत्रों जैसे सिक्किम, लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश, उत्तर बंगाल के क्षेत्रों कालिमपोंग, दार्जिलिंग और कुरसेआंग आदि में भी इसको त्यौहार की तरह मनाया जाता है।

2020 में बुद्ध पूर्णिमा कब है?
बुद्ध पूर्णिमा 7 मई, 2020 को है। इस दिन बौद्ध धर्म के उपासक बौद्ध मंदिरों में ध्वज फहराते हैं। महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं और उनके शिष्यों के संघ के सम्मान में स्तुति और भजन गाए जाते हैं। साथ ही बौद्ध धर्म के लोग विशेष रूप से इस दिन सफेद कपड़े पहनते हैं और ध्यान (ध्यान) में अपना दिन बिताते हैं।

महात्मा बुद्ध का जीवन परिचय
एशिया का ज्योतिपुंज कहे जाने वाले महात्मा गौतम बुद्ध का जन्म वैशाख मास की पूर्णमासी को कपिलवस्तु के लुम्बिनी में 563 ईसा पूर्व क्षत्रिय कुल में हुआ था। उनके बचपन का नाम सिद्धार्थ है था। उनके पिता का नाम शुद्धोधन और माता का नाम मायादेवी था। इनकी माता की मृत्यु उनके जन्म के सातवें दिन ही हो गयी थी जिसके बाद इनका पालन पोषण इनकी सौतेली माता प्रजापति गौतमी ने किया था। उनके पिता शाक्यगण के मुखिया थे और राजकुमार होने के कारण बुद्ध की परवरिश पूरे राजसी थथ-बाठ से हुईं।

16 वर्ष की आयु में बुद्ध का विवाह यशोधरा के साथ हुआ।
कुछ वर्ष पश्चात उन्हें पुत्र प्राप्ति हुई जिसका नाम राहुल रखा गया।
बुद्ध का मन बचपन से ही राजपाट में नहीं लगता था और हमेशा उन्हें एकांत में बैठा हुआ देखा जाता था।
माना जाता है कि गौतम बुद्ध विष्णुलोक से आई हुई आत्मा थे
यही कारण था कि सभी राजसी थथ उपलब्ध होने के बाद भी उन्हें यहाँ के सभी सुख फीके से लगते थे।
क्यों गौतम बुद्ध को दुखों से दूर रखा गया था?
जब गौतम बुद्ध अपनी माँ के गर्भ में थे तब इनकी माता ने एक दिन एक स्वप्न देखा कि छः हाथियों का एक झुंड अपनी सूंडो में कमल के फूल लाकर उनके चरणों में अर्पित कर रहे थे। इस स्वप्न के बारे में विद्वानों को बताने पर विद्वानों ने शुद्धोधन (महात्मा बुद्ध के पिता) को बताया कि आपकी होने वाली संतान पूरी दुनिया को जीत कर एक पराक्रमी शासक की तरह राज्य करेगी या फिर वे एक सन्यासी बन लोगों के बीच ज्ञान प्रचार करेंगे।

बुद्ध पूर्णिमा हिंदी : इसी कारण से बुद्ध की सभी सुख सुविधाओं का ध्यान उनके महल में ही रखा गया था। उनके पिता उन्हें जीवन में घटित होने वाले दुखों से कोसों दूर रखते थे ताकि विद्वानों द्वारा सन्यास धारण करने की बात कद रूप सत्य साबित न हो।

बुद्ध के गृहत्याग का क्या कारण था?
एक दिन महात्मा बुद्ध को कपिलवस्तु की सैर की इच्छा हुई और वे अपने सारथी को साथ लेकर चलने पर निकले। मार्ग में चार दृश्यों को देखकर घर त्याग कर सन्यास लेने का प्रण लिया।

बुर्जुग व्यक्ति
एक बीमार व्यक्ति
शव
एक सन्यासी
बुद्ध पूर्णिमा हिंदी : इनको देखकर बुद्ध का मन विचलित हो गया तो उनके सारथी ने उन्हें बताया कि ये जीवन का कटाव सत्य है। हर व्यक्ति को एक दिन बूढ़ा होना है और बुढ़ापा अपने साथ रोग लेकर आता है। इसके पश्चात मृत्यु का आना भी एक परम सत्य है। इन दृश्यों को देखने के उपरांत बुद्ध इस जन्म मरण के चक्र और मनुष्यों के दुखों का कारण और उसका समाधान ढूंढने के लिए व्याकुल हो उठे। उस समय उनकी आयु मात्र 29 वर्ष थी जिस समय उन्होंने गृहत्याग किया था। बौद्धधर्म में उनके गृहत्याग को महाभिनिष्क्रमण कहा गया है।

गीता जी के अध्याय 3 श्लोक 8 में, घर त्यागकर, हठयोग साधना करने को निषेध बताया है और कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करते-करते भक्ति कर्म करने को श्रेष्ठ बताया है। गृहत्याग के बाद बुद्ध ने वैशाली के आलार्कलाम जो की बुद्ध के पहले गुरु थे, उनसे सांख्य दर्शन की प्रथम पूजा की। उसके बाद राजगीर पहुँचकर अपने दूसरे गुरु रुद्रकरामपुत्त से शिक्षा ग्रहण की।

जब तक गुरू मिले न साचा तब
तक गुरू करो दस पाँच ।।

कबीर साहेब जी
बुद्ध पूर्णिमा हिंदी : मनुष्य जीवन में गुरु का बहुत महत्व है। एक गुरू ही है जो मानव जीवन को अनमोल बताता है और जन्म मृत्यु के रोग से छुटकारा दिला सकता है। हालांकि अल बुद्ध को उसके जीवनकाल में कोई कुछ ज्ञान ज्ञान देने वाला सच्चा गुरु न मिला। कबीर साहेब जी अपने सत्संग में बताते हैं कि पिछले पुण्य कर्मों वाली आत्मा परमात्मा को याद करें बिना नहीं रह पाती। तब मैया भी अपने पैरों में बेड़ी नहीं डाल सकती थीं।

कैसे बना सिद्धार्थ गौतम, राजा से महात्मा बुद्ध?
लेकिन बुद्ध को अपने सवालों का जवाब किसी गुरु से नहीं मिला। आगे चलकर उरुवेला में बुद्ध को उन्हीं की तरह पांच जिज्ञासु साधक मिले। 6 साल तक बिना अन्नजल ग्रहण किए कठिन तपस्या के बाद 35 वर्ष की अवस्था में वैशाख पूर्णिमा की रात निरंजना (फल्गु) नदी के किनारे बुद्ध को एक ज्योतिपुंज दिखाई दिया, जो कि ज्योति निरंजन काल ब्रह्म अपनी ज्योति रूप में दिखाई दे रहा था।

बुद्ध पूर्णिमा हिंदी : उनका शरीर मरणासन्न अवस्था में पहुँच गया था उनकी साधना भले ही गलत थी लेकिन वे भी परमपिता परमात्मा के ही बच्चे थे इसलिए परमात्मा ने एक माई को प्रेरणा की जिन्होंने उन्हें खीर खिलाई। दैनिक थोड़ा थोड़ा अन्न ग्रहण करने से उनकी स्थिति सुधरी, हालत ठीक होते ही उठकर खड़े हुए और उनका पहला कथन था

भुखमरी से मुक्ति नहीं मिल सकती अर्थात् भूखा रहने से भगवान नहीं मिलते।

महात्मा बुद्ध, बुद्ध पूर्णिमा उद्धरण हिंदी में
बौद्ध धर्म के अनुसार निर्वाण क्या है?
दौड़, का तात्पर्य है पुनर्जन्म का पथ, + निरस्त, का तात्पर्य है छोड़ना या “पुनर्जन्म के पथ से दूर होना। लालच, घृणा और भ्रम का नाश ही निर्वाण है। निर्वाण ही परम आनंद है। ”(बौद्ध धर्म के मतानुसार)। बुद्ध का आध्यात्मिक ज्ञान शून्य था। उन्होंने अपनी अल्पज्ञ बुद्धि के आधार पर अस्तुतात्मक अध्ययन की सरंचना की और कहा इन अष्टांगिक उपचार के पालन के उपरांत मनुष्य की भवतृष्णा नष्ट हो जाती है और उसे निर्वाण मोक्ष प्राप्त हो जाता है। जबकि ऐसा नहीं है।

बुद्ध पूर्णिमा हिंदी: बौद्धधर्म में पुनर्जन्म की मान्यता है लेकिन इसमें आत्मा की परिकल्पना भी नहीं है। बुद्ध के ज्ञान और समाधान से किसी को कोई लाभ नहीं हुआ तो बुद्ध की शिक्षाओं को मानने वालों ने ये समझ लिया कि भगवान होता ही नहीं है जबकि वास्तविकता तो ये थी कि महात्मा बुद्ध के पास वास्तविक ज्ञान ही नहीं था। अगर भक्ति करते हुए भी साधक को लाभ नहीं मिल रहा है तो ये समझ लें कि भक्ति करने कि विधि सही नहीं है, न कि भगवान होते ही नहीं हैं।

गीता अध्याय 16 के श्लोक 23-24 में प्रमाण है कि जो साधक शास्त्र पद्धति त्यागकर मनोमय आचरण करता है अर्थात् मनमानी साधना करता है, उसे न तो कोई सुख प्राप्त होता है, न कोई सिद्धि और मोक्ष। सब वीथ है। शास्त्र विरूद्ध साधना, भूखे रहने से और हठयोग करते हुए यदि साधक की मृत्यु होती है तो वह पुनर्जन्म और चौरासी लाख योनियों में जाने से बच नहीं सकता।

'' कबीर वाणी '' पृष्ठ 137 पर लिखा गया है शास्त्रानुकुल साधना करने से पूर्ण मोक्ष होगा। श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 18 श्लोक 62 में गीता ज्ञान दाता ने पूर्ण मोक्ष प्राप्ति के लिए अपने से अन्य भगवान की शरण में जाने को कहा है कि हे अर्जुन! सभी भाव से तू थम के शरण में जा रहा है। उस भगवान की कृपा से ही तू परम शान्ति को और सनातन परमधाम को प्राप्त होगा।

अंग्रेजी में पढ़ें: BUDDHA PURNIMA (Vesak Day) 2020: गौतम बुद्ध का पारिवारिक जीवन
गीता अध्याय 15 श्लोक 4 में भी गीता ज्ञान दाता ने अपने से अन्य भगवान की भक्ति करने और सनातन पद को प्राप्त करने को कहा है कि तत्त्वज्ञान की प्राप्ति के पश्चात् भगवान के बारे में परम पद (सनातन परमधाम) की खोज करनी चाहिए जहां जाने के पश्चात। साधक लौटकर संसार में कभी नहीं आता। उस भगवान की भक्ति करो जिसने संसार रूपी वृक्ष की रचना की है।

■ भावार्थ: - पूर्ण मोक्ष वही को कहते हैं जिसको प्राप्त करके साधक पुनः संसार में जन्म धारण नहीं करता। कभी जन्म-मरण के चक्र में न गिरे, दुख सुख सागर स्थान सत्यलोक में रहे, वह पूर्ण परम गति कही है।

बौद्ध धर्म की मान्यताएं ईश्वर के अस्तित्व के संदर्भ में

आध्यात्मिक ज्ञान न होने के कारण लोग आंखें मूंद कर बुद्ध के ज्ञान से प्रभावित हुए ताकि रूस, चीन, म्यांमार जैसे राष्ट्र बुद्ध के बताए मार्ग पर चलकर नास्तिक हो गए। बौद्धधर्म एकमात्र ऐसा धर्म जिसने भगवान के अस्तित्व को नकारा है, उदाहरण के लिए एक घर बिना मुखिया के और एक देश बिना प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के व्यवस्थित तरीके से नहीं चल सकता तो सोचने वाली बात है कि इतना बड़ा ब्रह्मांड और इसमें घूमने वाले ग्रह उपग्रह हैं। इतने व्यवस्थित तरीके से कैसे अपना कार्य कर रहे हैं?
बुद्ध पूर्णिमा हिंदी: बौद्ध धर्म में मान्यता है कि इंसान और अन्य जीव जंतुओं की उत्पत्ति भगवान ने नहीं की। ये सृष्टि अपने आप बनती है और अपने आप ही नष्ट हो जाती है। इनका मानना ​​है कि कोई भगवान या कोई शक्ति इस ब्रह्मांड को नहीं गई है। न स्वर्ग है और न नरक। बल्कि ये सब काल्पनिक हैं और भगवान की आराधना न करके व्यक्ति मेहनत करके कमाई करे और खाए बसे।

बुद्ध पूर्णिमा हिंदी : महात्मा बुद्ध ने अपने अनुयायियों को अच्छे कर्म करना, हठ योग करना, ध्यान लगाना, खुद को शारीरिक कष्ट देने पर ज़ोर दिया। बुद्ध का मानना ​​था कि शरीर को कष्ट देकर ही पिछले पाप कर्मों को नष्ट किया जा सकता है। लेकिन ये सब साधना हमारे धर्म ग्रंथों के अनुकूल नहीं है। बल्कि निर्वाण अर्थात् मोक्ष केवल शास्त्र अनुकूल साधना करने से ही सम्भव है जिसका प्रमाण हमारे धर्म ग्रंथों में है।

परमात्मा साकार है या निराकार?
बौद्ध धर्म की मान्यता अनुसार परमात्मा का कोई आकार नहीं है और न ही कोई सृष्टि रचने वाला है, लेकिन यह उनकी गलत धारणा है और इसमें तनिक भी सच्चाई नहीं है। हमारे धर्म ग्रंथों में पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब के सशरीर होने का स्पष्ट वर्णन है। इसके अतिरिक्त यह भी वर्णन है कि उसी सृष्टि के रचयिता हैं जो सबका पालन पोषण करते हैं।
■ कबीर सागर के अध्याय 26, ज्ञान की स्थिति बोध, पृष्ठ 83: पर सत्य पुरुष के शरीर का विशेष वर्णन है कि भगवान नर आकार (मानव सदृश) है। उसके हाथ, पैर, नाक, कान, सिर, मस्तक सबकी शोभा बताई है।' वह गले में पुष्प की माला पहने हुए हैं।

साखी-अब मैं कहूं तोहि सों चित मत।
कहै कबीर पुरूष को, याही रूप निजी सार।

पृष्ठ 82 पर वाणी में लिखा है: -

पुरुष गले की सूजन।
हाथ अमर अंकुर रिसाला।

उपरोक्त प्रमाण से स्पष्ट है कि भगवान का मनुष्य जैसा शरीर है। उसका प्रत्येक अंग प्रकाशमान है और वह अविनाशी परमात्मा अमर लोक में विद्यमान है।

सृष्टि के रचयिता कबीर परमेश्वर हैं
पूर्ण परमात्मा (कबीर साहेब) ने ही सम्पूर्ण सृष्टि की रचना की है जिसका प्रमाण चारों ओर वे, गीता जी, कबीर सागर आदि ग्रंथों में मिलता है जो इस प्रकार है: -

■ अथर्ववेद काण्ड नं। ४ अनुवाक नं। 1 मंत्र नं। 1

ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्त्वद् वि सीमतः शुचो वेन शुः।
स बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठः सतश्च योनिमृतश्च वि वः ।।

■ भावार्थ: - इस श्लोक में स्वयंमा (काल- इक्कीस लोकों का स्वामी) कह रही है कि सनातन भगवान कबीर साहेब (ब्रह्म ब्रह्मण्डों का स्वामी) ने स्वयं अनामय (अनामी) लोक सत्यलोक में प्रकट होकर अपने सूज-बज़ से कपड़े पहने। तरह रचना द्वारा ऊपर के सतलोक आदि को सीमा रहित स्वप्रकाशित अजर-अमर अर्थात् अविनाशी ठहराए और नीचे के परब्रह्म के सात शंख ब्रह्माण्ड और ब्रह्म के 21 ब्रह्माण्ड व इन छोटी-से छोटी रचना समान परमात्मा ने अस्थाई की है।

■ अथर्ववेद काण्ड नं। ४ अनुवाक नं। 1 मंत्र नं। 4

सः हि दिवः सः पृथिव्या ऋतस्तस्य क्षेमं रोदसी अस्कभयत्।
महान् युक्ति अस्कभयद् वि जातो द्यं सर्प पार्थिवं च रजः।

■ भावार्थ: है कि ऊपर के चारों लोक सत्यलोक, अलख लोक, अगम लोक, अनामी लोक, यह तो अजार-अमर स्थाई अर्थात् अविनाशी रचे हैं और नीचे के ब्रह्म और परब्रह्म के लोकों को अस्थाई रचना द्वारा और अन्य छोटे-छोटे लोक भी उसी भगवान ने रच कर स्थिर किया। पूर्ण पुरुष कविर्देव तो सबसे बड़ा है अर्थात् अल्क्तिमान है और सभी ब्रह्माण्ड उसी ने रचे हैं।

■ गीता अध्याय नं। 15 का श्लोक नं। 17

उत्तमः, पुरुषः, तु, अन्यः, परमात्मा, इति, उदाहृतः,
यः, लोकत्रयम् अविश्य, बिभर्ति, अव्ययः, ईश्वरः।

लिंगक्वाट प्रमाणों से यह स्पष्ट है कि परमात्मा सशरीर है, उसका नाम कबीर है। जिन्होंने छः दिन में सृष्टि रची और सातवें दिन तख्त पर बिराजित किया। उन्हीं की बताई भक्ति जो कि हमारे धर्म ग्रंथो में वर्णित है, करने से मोक्ष सम्भव है। इसके अतिरिक्त कोई भी शास्त्र विरूद्ध साधना जैसे घर त्यागना, हठयोग करना, ध्यान लगाना, सन्यासी बनना, उपवास रखना, मौन धारण करना, मांगकर खाना इत्यादि सब व्यर्थ चीजें हैं। (किसी भी साधक के लिए सृष्टि रचना की संपूर्ण जानकारी होना अनिवार्य है, इसके लिए निश्चित रूप से पुस्तक ज्ञान गंगा है। आप पुस्तक को पीडीएफ रूप में डाऊलेट कर पढ़ सकते हैं, सूची नीचे देखें)

भगवान के अस्तित्व को नकारना इंसान की नादानी है
बौद्धधर्म जो तप और ध्यान को मोक्ष प्राप्त करने का मार्ग कहता है, उसके बारे में श्रीमद्भागवत गीता के अध्याय न .17 के श्लोक 5 में कहा गया है: -।

अयोगविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।
दंभाह्नकरसंयुक्ता: कामग्रबलस्विता: कार


अथार्त जो मनुष्य शास्त्र विधि से रहित केवल मन कल्पित घोर तप को तपते हैं और दम्भ और अहंकार से युक्त और कामना, आसक्ति और बल के अभिमान से भी युक्त हैं। गीता में घोर तप और ध्यान साधना को गलत बताया गया है।

पूर्ण परमात्मा व पूर्ण संत की पहचान
पूर्ण भगवान हर युग में या तो खुद आते हैं या अपना नुमाइंदा भेजते हैं, जो तत्वज्ञान से साधक को परिचित करवाकर शास्त्र अनुकूल मोक्ष दायक साधना प्रदान करते हैं। उस तत्वदर्शी संत की पहचान गीता अध्याय न। 15 श्लोक 1 से 4, 16 में वर्णित है, जिसमें उल्टे लटके वृक्ष का वर्णन है। जिसके बारे में गीता ज्ञान दाता ने साफ कहा है कि जो संत इस उल्टे लटके संसार रूपी वृक्ष के सभी विभागों का वर्णन ठीक ठीक कर देगा वही तत्वदर्शी संत होगा।
वर्तमान समय में तत्वदर्शी संत कौन है?
आध्यात्मिक ज्ञान के अनुसार वर्तमान समय तक उल्टे लटके वृक्ष की गुत्थी को कोई भी उग्र संत या महामंडलेश्वर नहीं सुलझा पाया गया।] केवल सच्चे संत रामपाल जी महाराज जी ही हैं जिन्होंने सभी वेदों, गीता जी, पुराण आदि में प्रमाण सहित ये सिद्ध कर दिया है कि कबीर साहेब जी ही पूर्ण भगवान हैं और उन्हीं की भक्ति करने से साधक अपने निजीधामलोक को हो सकता है। बुद्ध जैसी साधना का अनुसरण करने से न तो निर्वाण होगा न परमात्मा मिलेगा। अधिक जानकारी के लिए अवश्य देखें सत्संग साधना केंद्र पर प्रतिदिन शाम 7:30 बजे से। यदि आप संत रामपाल जी महाराज से नाम दीक्षा लेना चाहते हैं तो पृष्ठ नाम दीक्षा फॉर्म भरें।

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कबीर साहेब के हिन्दू मुस्लिम को चेताने और नारी सम्मान के प्रसिद्ध दोहे अर्थ सहित (Kabir Saheb Ke Dohe in Hindi)