बेरोजगारी
देश में बेरोजगारी की दर में करीब 200 फीसदी का इजाफा, हर चौथे भारतीय पर काम नहीं, कई राज्यों में 50 फीसदी के करीब लोग बेरोजगार
देश में बेरोजगारी की दर 23.5 फीसदी हुई, कई राज्यों में 50 पर्सेंट बेरोजगार है।
देश में लॉकडाउन कोरोना के संकट से निपटने के लिए लागू किया गया है, लेकिन अब इसके चलते रोजगार पर भी मार पड़ने लगी है। अप्रैल महीने में देश में बेरोजगारी की दर में 14.8 फीसदी का इजाफा हुआ है। देश में बेरोजगारी की दर अब 23.5 फीसदी पहुंच गई है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी के एक सर्वे में यह बात सामने आई है। मार्च के मुकाबले बेरोजगारी की दर में 200 फीसदी का इजाफा है। यही नहीं कुछ राज्यों का हाल यह है कि लगभग हर दूसरा आदमी बेरोजगारी की स्थिति में है। तमिलनाडु में बेरोजगारी की दर 49.8 फीसदी है, जबकि झारखंड में यह दर तेजी से बढ़ते हुए 49.8 पर्सेंट हुआ है। बिहार में यह आंकड़ा 46.6 फीसदी है।
हालांकि पंजाब में बेरोजगारी की दर महज 2.9 फीसदी ही है, जबकि छत्तीसगढ़ में 3.4 पर्सेंट है। तेलंगाना में 6.2 फीसदी है। दक्षिण भारतीय राज्यों की बात करें तो तमिलनाडु में हालात बेहद विपरीत देखने को मिले हैं। सूबे में बेरोजगारी की दर मार्च में महज 6.3 फीसदी ही थी, जो अप्रैल में बढ़कर 49.8 फीसदी हो गई। अब यदि बीते साल मई की बात करें तो तब यह 0.9 फीसदी ही थी। इस लिहाज से देखें तो बीते एक साल में तमिलनाडु में रोजगार के मामले में हालात काफी खराब हो गए हैं।
यही नहीं देश में कोरोना वायरस महामारी के प्रसार पर अंकुश लगाने के लिए लॉकडाउन से पहले ही मार्च महीने में बेरोजगारी 43 महीनों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई थी। मार्च महीने में बेरोजगारी दर (या अर्थव्यवस्था में बेरोजगार लोगों की हिस्सेदारी) 8.7 फीसदी थी, जो सितंबर 2016 के बाद से सबसे अधिक थी। इस साल जनवरी में यह दर 7.16 फीसदी थी। बता दें कि देश में कोरोना से निपटने के लिए 24 मार्च से ही लॉकडाउन चल रहा है, जिसका 3 मई को आखिरी दिन है। हालांकि अभी लॉकडाउन को लेकर सरकार की ओर से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है
कोरोना वायरस के प्रसार के साथ ही लगभग हर हफ्ते किसी न किसी क्षेत्र से हजारों कर्मचारियों को बिना वेतन के छुट्टी देने, नौकरियों से निकालने, वेतन में भारी कटौती की खबरें आ रही हैं.
माल्स, रेस्तरां, बार, होटल सब बंद हैं, विमान सेवाओं और अन्य आवाजही के साधनों पर रोक लगी हुई है. फ़ैक्टरियां, कारखाने सभी ठप पड़े हैं.
ऐसे में संस्थान लगातार लोगों की छंटनी कर रहे हैं और हर कोई इसी डर के साये में जी रहा है कि न जाने कब उसकी नौकरी चली जाए.
इसके अलावा स्वरोजगार में लगे लोग, छोटे-मोटे काम धंधे करके परिवार चलाने वाले लोग सभी घर में बैठे हैं और उनकी आमदनी का कोई स्रोत नहीं है.
बॉस्टन कॉलेज में काउंसिलिंग मनोविज्ञान के प्रोफ़ेसर और 'द इंपोर्टेन्स ऑफ वर्क इन अन एज ऑफ अनसर्टेनिटी : द इरोडिंग वर्क एक्सपिरियन्स इन अमेरिका' क़िताब के लेखक डेविड ब्लूस्टेन कहते हैं, "बेरोज़गारी की वैश्विक महामारी आने वाली है. मैं इसे संकट के भीतर का संकट कहता हूँ."
जिन लोगों की नौकरियाँ अचानक चली गयी हैं या लॉकडाउन के कारण रोज़गार अचानक बंद हो गया है, उन्हें आर्थिक परेशानी के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है.
हालात कठिन हैं
39 वर्ष के जेम्स बेल जिस बार में काम करते थे, उसके बंद होते ही उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया. अपने पाँच लोगों के परिवार को चलाने के लिए वेतन और टिप पर पूरी तरह निर्भर जेम्स के लिए यह एक बड़ा झटका था.
वो कहते हैं, "मुझे अंदाजा था कि कोरोना की ख़बरों के बाद बार में बहुत कम लोग आ रहे हैं, लेकिन यह अंदेशा नहीं था कि मेरी नौकरी ही चली जाएगी."
अब वह बेरोज़गारी भत्ते और विभिन्न चैरिटेबल संस्थाओं से वित्तीय सहायता पाने के लिए कोशिश कर रहे हैं.
लेकिन अचानक आजीविका चली जाने के दुख पर एक सुकून यह भी है कि अब उन्हें हर दिन वायरस से संक्रमित होने के डर से मुक्ति मिल गयी है.
वो कहते हैं, "नौकरी जाने से एक हफ्ते पहले तक मैं बार के दरवाज़ों के हैंडल को बार-बार डिसिनफ़ेक्ट कर रहा था."
उनके मुताबिक़ उनकी भावनात्मक स्थिति बहुत डांवाडोल है. नौकरी जाने का तनाव और महामारी का डर दोनों उन्हें परेशान करता रहता है.
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